°°° न्याय दो-प्याजा °°°

जज ने सामने कटघरे में मौजूद किसान को एक बार भरपूर नजर से देखा और फिर प्रतिवादी वकील से प्रश्न किया – “बोलिये क्या कहते हैं ? क्या आपके मुवक्किल ने अपने पड़ोसी की भैंसे चुरायी हैं??”
किसान के वकील ने पेशेवर लहजे में गला खँखारकर जवाब दिया – “माननीय , ये सच है कि मेरा मुवक्किल उद्दंड और झगड़ालू है । जैसा कि पुलिस अधिकारी ने अपने बयान में कहा , पहले भी वो मारपीट के कई मामलों में नामित होता रहा है.. लेकिन बावजूद इसके मेरे मुवक्किल के बारे में कोई भी गवाह नहीं है कि उसने कभी चोरी या छीन-झपाटे जैसा कोई अपराध किया हो!”
इसके बाद दर्जनों गवाहों के बयान हुये । सबने मुल्जिम को झगड़ालू बताया लेकिन किसी ने उसके चोर होने का संदेह नही जताया । सबका मानना था कि मुल्जिम ने अपने पड़ोसी को पीटा होगा और पडोसी ने झूठी रपट दर्ज करायी होगी।
इन सबके बीच मुल्जिम लगातार जज को देख रहा था । उसकी दृष्टि में परिचय की एक कौंध थी , जिसका स्फुटन जज को सरासर महसूस हो रहा था।
सुनवाई के दौरान बार बार न्यायाधीश महोदय का मन बचपन की उस घटना की तरफ घूम जाता था , जब शहर के स्कूल में गांव से आये हुये एक उद्दंड और देहाती सहपाठी के द्वारा रोज-रोज की पिटाई से तंग आकर उन्होंने उसपर अपने बैग से किताबें चुराने का इल्जाम लगवाकर हेडमास्टर से खूब पिटवाया था । बाद में वो ऐसी घटनाओं के लिए बारम्बार पीटा जाता । आखिरकार वो फेल हो गया और वापस अपने गांव लौट गया ।
खैर ! अंत में न्याय करने का समय आया तो न्यायाधीश ने अपना निर्णय सुनाते हुये कहा – “प्रथम दृष्टया ऐसा महसूस होता है कि मुल्जिम किसान बहुत ही बदमाश तबीयत का आदमी है । दूसरे , इसके द्वारा भविष्य में चोर हो जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिये कोर्ट इसे पर्याप्त सबूतों के अभाव में चोरी के आरोप से मुक्त करती है .. लेकिन अपनी उद्दंडता के सुधार के लिये दो माह का कठोर सश्रम कारावास और 250 रूपये का अर्थदंड लगाती है । अर्थदंड न दे पाने की दशा में एक माह का अतिरिक्त कारावास !”

किसान ने फैसले को सर झुकाये हुये चुपचाप सुना और उसकी आँखों से दो बूंद आंसू ढुलक गये । उसने भर्राये गले से कहा – “दो महीने में मेरी खेती बर्बाद हो जायेगी और मेरा पडोसी मुझपर हंसेगा कि कैसे उसने मुझे झूठे इल्जाम में फंसाया ! जज साहब आपने दूसरी बार न्याय की जगह अन्याय किया है । पहली बार पच्चीस साल पहले स्कूल में .. और दूसरी बार आज ! पहली बार न किया होता तो शायद आज मैं भी पढ़ लिखकर कम से कम अदालत का मुंशी तो बन ही जाता!!”

जज ने हथौड़े को मेज पर दो बार बड़ी जोर की आवाज से पटका और उच्च स्वर में कहा “अदालत का समय खत्म हुआ!!”

Atul Shukla April 01, 2017 at 01:00PM

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s