सृजन संवाद रचना प्रतियोगिता (१) की कहानी विधा में विजयी रचनायें इस प्रकार हैं ।
विजेता – ‘प्रतिशोध’ (रिवेश प्रताप सिंह)
उपविजेता- ‘शोक’ (Neeraj Kumar Neer)
उल्लेखनीय तीन
१- पेपरवेट (सुधीर द्विवेदी)
२- संदेसे आते हैं (अरुण राजपुरोहित)
३- नैना (सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’)
एक पुरस्कार सृजन संवाद वेबसाइट अपनी तरफ से विशेष तौर पर ‘सोलमेट्स'(Seema Singh) कहानी , जो कि पारलौकिक विज्ञान विषयवस्तु को कथ्य बनाकर प्रभावी रूप से लिखी गयी है …को देती है। (इस आपत्ति के साथ कि , कहानी अपेक्षा से बहुत ज्यादा लम्बी है।)

प्रस्तुत है विजेता कहानी ‘प्रतिशोध’ । कहानी आज के दो दशक पूर्व के ग्रामीण परिदृश्य को चित्रित करती है । कहानी में में ग्रामीण जीवन की व्यथा है , विडम्बना है और व्यवस्था के प्रति एक मूक , निरीह तथा हताश/कायर प्रतिरोध भी है । कहानी का अंत बहुत निराशा के साथ ऐसा तमाचा मारता है , जिसकी अनुगूँज सहज ही महसूस की जा सकती है । “मालिक , हमारे बच्चों को अपने दुआर पर लगाइयेगा मत!” इस वाक्य में कितनी वेदना , कितना रूदन और निहित आक्रोश है आप स्वयं महसूस करें ।

★ ★ ★

सुबह सुबह गांव में सूरज की रोशनी उतनी चटक भले न उतरती हो, लेकिन प्रधान जी के दुआर से दो चटक आवाज स्पष्ट सुनी जा सकती थी- पहला हरखू के चाय सुड़कने की और दूसरा बछड़े के चपर-चपर दूध पीने की ।
भोर होते ही हरखू गोशाला में गाय- भैसों को नाँद पर लगाकर , पूरा दुआरा बुहारते। फिर दूध निकालने के बाद बैठ जाते , पूरा एक गिलास चाय लेकर।
कहने के लिए हरखू, भले ही हरवाह हों ,लेकिन घर की पूरी जिम्मेदारी, खेती से जानवर तक, इंजन से टैक्टर तक, सिंचाई, बुआई, कटाई, बीज, खाद सब हरखू के माथे पर ही रहता। हां हरखू मुक्त था तो केवल एक जिम्मेदारी से, वो था …रूपये और बैंक का हिसाब।
वैसे भी खाने को दो जून खाना, तीन-चार बार चाय और दिन भर सुर्ती मिलती रहे तो और क्या चाहिए था हरखू को?
उधर प्रधान जी के जिम्मे अखबार,चौराहा, तहसील, सुपारी और सांझ को बैठकर हरखू से दिनभर के कामों का ब्यौरा और नये काम का आवंटन। और प्रधान जी को फिक्र भी काहें की! जब हरखू जैसा जिम्मेदार , फ़रमाबरदार और ईमानदार आदमी उनके पास हो।

ऐसा नहीं कि मालिक हरखू का ख्याल नहीं रखते। उसके खाने-पीने,दवा- दारू,रहने-सहने सबका इंतजाम मालिक ही करते। उसके मलिकार के सभी पुराने कुर्तो और जूतों पर पहला हक किसी का था तो हरखू का ही था।

जो अधिकार बाहरी मामलों में हरखू का था कुछ वैसा ही ‘हरखू बहु’ यानी कमली का घर के भीतर था। भीतर, बर्तन, झाड़ू, अनाज की जिम्मेदारी सब हरखू बहु के माथे। हरखू के दोनों लड़के एक आठ दूसरा छह साल का। दोनों घूम-फिर के मलिकार के घर ही रहते। हरखू बहु को जो भी जरूरत रहती उसके लिये भीतर ‘मलकिन’ और बाहर ‘मलिकार’।

वैसे मलिकार अगर हरखू की बात कभी काट भी दें लेकिन हरखू बहु की बात जरूर सुन लेते थे। हरखू तो कहता ही रहता ”मलिकार के रहते फिकर काहें की ?” वैसे उसकी जरूरत भी थी ही कितनी ! बस पेट भरा रहना चाहिए। उसके लुगाई का शौक-श्रृंगार तो मालिक-मालकिन पूरा कर ही देते और मेहरारू को रार ठानने का बहाना भी नहीं मिलता।
हरखू को दुनियादारी से कोई खास मतलब नहीं रहता। बस, अपने काम से काम। वह न तो गांव में किसी से दबता और न ही डरता। और डरे भी क्यों,जब गांव के सबसे मजबूत और घने वृक्ष के नीचे उसका आशियाना था। हरखू अपने मलिकार का आदेश तो सिर आंखों पर लिये फिरता… ‘मलिकार’ अगर सौ गाली भी दे दें तो हँस कर टाल जाता..उसे रत्ती भर भी न तो दिल से लगाता और न ही कोई शिकवा करता। जब बचपन से अड़तीस बरस मलिकार के घर की छाया में गुजर गये तो मलिकार की बात और डांट का क्या! है भी सब कुछ तो उन्हीं के ही भरोसे!!

मालिक जब शाम को घूम-घाम कर आते तो हरखू को बुलाकर रोज साठ रुपये देते-जिसमें एक शीशी अंग्रेज़ी शराब अपने लिये मंगाते और दस रूपये हरखू को देते कच्ची शराब के लिये। हरखू रोज रात को कच्ची पीकर अपने मलिकार के लिये शीशी लेकर आता और थोड़ा बदले मिजाज़ में बात-ठिठोली करता और खा-पीकर सो जाता।

एक दिन आधी रात को गोशाला से कुछ खटर-पटर की आवाज आयी तो हरखू आवाज सुनकर गोशाला की तरफ लपका। लेकिन वहाँ द्वार पर से ही उसे चूड़ियों की खनक सुनायी दी। हरखू ठमका! कुछ रुक कर वह धीमे कदमों से गोशाला की दीवार की तरफ बढ़ा तो उसके कानों में कुछ खुसुर-फुसुर की आवाज आयी। आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगी। ‘अरे ! यह आवाज़ तो कमली और मलिकार की थी!!’ दिल धक् सा रह गया! ‘इतनी रात गोशाले में?’ धड़कनें तेज हो गयीं। मन हुआ कि बेधड़क घुस जायें गोशाला में लेकिन कोई जंजीर थी जो हरखू के पैरों को बांधे रखी थी। हरखू के आंखों के सामने एक काल्पनिक चित्र घुमड़ने लगा। लेकिन हरखू इतनी हिम्मत नहीं बाँध पाया कि वह इस सच का पर्दाफाश कर दे और वह हताश होकर बोझिल कदमों से अपने खाट पर लौट आया। लौट तो आया …लेकिन निगाह अभी भी गोशाले के द्वार पर ही टिकी थी। आधे घंटे बाद उसकी पत्नी और उसके मलिकार गोशाले से निकल कर अपनी जगह पर बढ़े। हरखू बहु तो निश्चिंत चली गयी लेकिन अपने कमरे में घुसते वक्त मलिकार को हरखू के जगने का अंदेशा हो चुका था।
उस पूरी रात, हरखू बिस्तर पर बंद आंखों में जागते हुए काट दिया। सुबह गोशाले में गायें नाँद पर जाने का इंतजार कर रहीं थीं लेकिन हरखू आज सोया कहाँ था, जो उसको जागने के लिये गायों की आवाज की जरूरत पड़ती। सेवक तो सबकुछ हार कर शून्य में डूबा था। गायों के बां-बां की आवाज सुनकर मालिक जोर से चिल्लाये ”हरखूआ!” ऐ हरखुआ!!” मालिक की आवाज सुनते ही उसके शरीर हरकत में हुई और वह चुपचाप गोशाले में चला गया। आज पहली बार हरखू बिना एक शब्द बोले गायों का काम करता रहा। दुआर बुहारने पर भी खरहरे में वो आवाज न थी जो रोज बुहारने से आती।

सब काम करने के बाद हरखू आज चाय लेने अन्दर रसोई में नहीं गया और जब बहुत देर हो गई तो उसकी पत्नी चाय लेकर बाहर आयी और पूछी- “का बात है? आज चाय लेने नहीं आये?” लेकिन हरखू ने न तो कोई उत्तर दिया और न ही उसकी तरफ सिर उठा कर देखा। गिलास की चाय अपनी गर्मी खोकर पानी हो गयी लेकिन हरखू अभी उतनी ही तपन में बैठा रहा और फिर कुछ देर में उठकर अपने घर चल दिया। दो घंटे बाद उसकी पत्नी कमली जब अपने घर पहुंची तो देखा कि हरखू खटिया पर एक करवट लेटकर एक हाथ से जमीन पर कुछ आड़ी तिरछी लकीरें खींच रहा है।
हरखू बहु ने धीरे से उसके माथे को छुआ और पूछ पड़ी-”का बात है, तबियत ठीक नाईं ह का ?”
हरखू बिना उसकी ओर देखे उसका हाथ झटकते हुए चीखा- ” न छू हमके, हम तोहरे जइसे छिनार औरत के सामने नाईं पड़ल चाहत”… कमली का चेहरा फक्क पड़ गया…सहमते हुए बोली- ”अरे का बात है ? काहें अइसन बोलत हवअ?”
”चुप रहु ! जब ते मलिकार के छू दिहली त बचल का?…ओह! बहुत बड़ा दगा भइल हमरे साथ!”
कमली की जबान अटक गई। हकलाकर बोली “तू गलत समझत हवs हम अइसन कुछ नाईं कइली हंs।”
“कुछ नाईं कइलू?” वह पलटा,उसकी आंखों में गुस्सा नहीं एक अजीब किस्म की बेबसी थी-”हमरे आँखी के सामने से तू आधी रात मलिकार के साथ ‘घाट’ करके निकरलू और कहत हउ कि हम अइसन नाईं हईं?”
कमली कुछ ही मिनटों में टूट सी गई और उसकी आंखों से लाज आँसू बनकर उसके प्रायश्चित्त की अगवानी करने लगी। हरखू लगातार ताने और गालियाँ देता रहा। कमली कुछ देर तो सिर झुकाकर सब सुनती रही अंततः प्रायश्चित प्रतिकार में बदला और वह बिफरकर बोली- “जब सब मलिकार के भरोसे है त हमार इज्जत की कौन कीमत? जब से डोली से उतरे हैं तब से केवल मलिकार-मलिकार त सुने हैं हम। तूं त केवल मलिकार के हुकुम बजावत हव। हम त आज तक जनबे न कईलीं कि मरद का होत है! सेनुरदान करे और बच्चा होखइले से केहु मरद होत है का? और सब गलती हमरे हs का। तुहार हिम्मत है तs मलिकार के भी दुइ शब्द बोलि के दिखावs।”
हरखू इस आघात से तिलमिला कर चीखा! ”काहें न कहेंगे मलिकार से ? कवनो हम गद्दारी किये हैं कि डेरायेंगे?? बचपने से वहीं पले-बढ़े लेकिन मजाल है कि घर के कवनो लड़की और औरत पर गंदी नजर रखें हों! हम तो मलिकार के इज्जत को आपन इज्जत समझ के निभावत रहे। हमें का पता कि मलिकार के नजर में हमार इज्ज़त दुई कौड़ी के हs!और हाँ मालिक खर्ची चलावत हं त हमहूँ दिनभर जानवर जइसन खटत हईं। कौनो मुफत में हमार खयाल नाहीं करत हैं मलिकार..” और फिर बड़बड़ाते हुए चल पड़ा हवेली की ओर। क्रोध,भय, लज्जा और अपमान के सभी भावों को नसों में एक साथ घोलकर। जैसे-जैसे उसके कदम, हवेली की तरफ बढ़ रहे थे वैसे-वैसे मालिक का व्यक्तित्व उसके क्रोध पर हथकड़ी लगाने लगा । लेकिन मन में यह लगातार चल रहा था कि मालिक से पूछेंगे जरूर। तब तक आवाज आयी “का रे हरखूआ, कहां रहे आज दिन भर?”..लेकिन हरखू अपने होंठ भींच लिया।
“का बात है, जबाब काहें न देता?” कहते हुए मलिकार उसके पास तक पहुँच गये लेकिन हरखू के चेहरे का रंग और बदला हुआ भाव उनसे मौन युद्ध करता रहा । हरखू एक चुप हजार चुप! प्रधान डिगने लगे और सहसा कुछ न सूझा तो उन्होंने दो चाय के लिये आवाज लगायी और चुपचाप हरखू के सामने खाट पर बैठ गये तथा अपनी शर्म छुड़ाने के लिए इधर-उधर की बात करने लगे। हरखू एक शब्द न बोला…चुपचाप उठा, गोशाले में चला गया और प्रधान अन्तर्द्वन्द्व में..!
मालिक को ग्लानि कितनी थी यह बयान करना मुश्किल है लेकिन क्षणिक लज्जा अवश्य थी। सोचने लगे, ‘अरे ! हरखू वही है न जो रोज गालियाँ सुनकर भी मुस्करा कर चला जाता है। दो चार दिन में सब भूल जायेगा। कब से हरखुआ इतना स्वाभिमानी हो गया ?’
हरखू गोशाला से निकल कर अपने घर की तरफ मुड़ा ही था कि मालिक ने आवाज लगाई “हरखू.. ए हरखू!”
आज हरखू की बिल्कुल इच्छा न थी कि पलट कर देखे भी लेकिन जाने कौन सा भय या संकोच था जिसने उसके कदम मोड़ दिये । और वह धीरे से मालिक के खटिया के सामने खड़ा हो गया .. लेकिन नजर अभी भी नीचे ही थी। चेहरा बिल्कुल बुझा-बुझा।
मलिकार कुर्ते से सत्तर रूपये निकाल कर बोले-”का बात है हरखू, आज शीशी नहीं लाना है का?बड़े तेज़ी से भागे जा रहा है।”
”आज हम शराब ना पीयेंगे मालिक”हरखू बेरूखी से बोल गया।
“शराब न पीयेंगे ? अरे तूं कब से सत्संगी बन गया रे। काहें न पीयेगा पहले तो कभी मना न किया।”
“आज पीये का मन नाहीं है मलिकार” सेवक ने सख्त लहज़े में कहा।
“अच्छा! चल आज तुझको भी अंग्रेज़ी पिलाते हैं,अंग्रेज़ी पीयेगा तो तबियत बदल जायेगी।”और मालिक ने डेढ़ सौ रूपया निकाल कर हरखू के कुर्ते में जबरदस्ती ठूंस दिया। हरखू ने कुछ कहना चाहा कि मलिकार डपटकर बोले “अच्छा जो लेकर आव जल्दी!” सेवक आधी जिन्दगी में इतनी हुज्जत अपने मालिक से की ही न थी। कैसे….वो दुबारा मना करता भला ? और हरखू बढ़ चला बाज़ार के तरफ, भारी कदमों से, मन में सवालों का वजन लेकर। यह सच है कि हरखू कई सालों से शराब पीने के कारण लती सा हो चुका था। दिनभर खटने के बाद, वह बड़ी फुर्ती से शीशी लेने बाज़ार की तरफ भागता। लेकिन आज हृदय की वेदना उसके लत को कुचल चुकी थी। सेवक जब गांव के रास्ते से गुजरा तो वह ध्यान से दक्षिण टोला के बस्ती में पड़े मड़इयों को निहारने लगा। क्योंकि इन्हीं मड़इयों के पीछे ही तो उसका दो कमरे का पक्का मकान है, जिसे उसके मलिकार नें इसकी सेवा से खुश होकर खुद बनवाया था। मड़ई के बाहर चिखुरी के बच्चे मांड़ भात खा रहे थे। हरखू का ध्यान अपने बच्चों पर गया कि ‘उसके बच्चे मलिकार के घर जरूर इनसे बढ़िया खा रहे होंगे।’ लेकिन मांड़ भात खाकर चिखुरी के बच्चे भी तो कितने खुश हैं। मड़ई के बरामदे में ‘तेजू बहु चीखुरी’ अपने मरद के सिर पर तेल रखकर मालिश कर रही थी। तेजू आँख मूंदे किसी दूसरी दुनिया में सैर कर रहा था। हरखू का मन बेचैन हो उठा। वह सोचने लगा कि ‘पूरी बस्ती में अंधेरा है लेकिन इनके चेहरों पर चमक है, हँसी है।’ हरखू ने पलट कर हवेली की ओर देखा जो दूर से जगमगा रही थी लेकिन हरखू के चेहरे पर हवेली से आती प्रकाश की एक किरण भी अपमान की कालिख मल रही थी। सेवक ने अपने कदम बड़ा दिए.. अवसाद, ग्लानि और आघात का बोझ लेकर और निकल गया बाज़ार की ओर ,अपने मलिकार का हुकुम बजाने।

आज पहली बार हुआ कि दो घंटे बीतने तक हरखू का पता न चला। मालिक भी कई बार रास्ते की तरफ झांक चुके, लेकिन हरखू न दिखा। प्रधान बेचैन भी थे और कुछ भयभीत भी ..लेकिन कहें किससे ?
तभी अचानक गौशाले से गायों के चिल्लाने की तेज आवाज़ें आने लगीं। प्रधान जी चौंक उठे कि ‘एक साथ सभी जानवर क्यूं आवाज़ लगाने लगे। अवश्य कोई बात है।’ प्रधान जी तेज़ी से गोशाले की तरफ लपके गौशाले की गायें अपनें हौदे से मुंह उठाकार प्रधान जी तरफ देखने लगीं। गोशाले के समीप अंधेरा था कुछ रोशनी, हवेली की खिड़कियों से छन कर आ रहीं थीं। प्रधान जब गोशाले के करीब पहुंचे तो देखा कि हरखू गोशाले के पास गिरा पड़ा था। हरखू के शरीर में अकड़न और मुंह से झाग निकल रहा था। प्रधान की धड़कने बढ़ गयीं वह चीखकर बोले-“हरखूआ!”..हरखू बुझती आँखों से अपने मालिक को देखा और काँपते हाथों से उनकी शराब की बोतल थमाने लगा। प्रधान बोतल को बिना देखे हरखू का कन्धा पकड़कर बोले- “हरखुआ ,का हुआ रे तुझको ?” हरखू ने अपना सिर दूसरी ओर घुमाते हुए अपनी दूसरी हाथ की मुठ्ठी खोल दी जिसमें उसके मलिकार के प्रश्न का जबाब छुपा था।
“सल्फास! तूने जहर खा लिया ! अरे बाप ! इ का अनर्थ किया रे हरखूआ..?.”
हरखू के मुख से पीड़ा के अन्तिम शब्द फूट पड़े..”मलिकार हम आपसे, न त झगड़ा कर पायेंगे और न ही यहाँ घुट-घुट के जी पायेंगे। आपका दुआर छोड़ देगें तो जायेंगे कहाँ ? मलिकार रोज घुट-घुट मुएगें ऐसे अच्छा कि…..” हरखू की बात समाप्ति तक मलिकार टूट गये और हरखू के कंधे पर सिर टिकाकर रोने लगे।
“मलिकार,हमरे बच्चों को अपने दुआर पर लगाइगा मत..” और इस अन्तिम शब्द के साथ हरखू के नेत्र,अपने कोनों से आंसुओं की लकीर खीचना बंद कर दिये। शायद उसके आँसू उसके आंखों के पत्थर बनने का इंतज़ार कर रहे थे..
हरखू आज मालिक को छोड़कर चला गया लेकिन एक संतोष लेकर गया कि उसने मालिक का अन्तिम आदेश पूरा करके ही प्राण छोड़े। April 08, 2017 at 12:52AM

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