सृजन संवाद रचना प्रतियोगिता की उपविजेता कहानी ‘शोक’। रचनाकार नीरज कुमार ‘नीर’ मूलतः कवि हैं । उनके लेखन में वैसा ही प्रवाह देखने को मिलता है । सादगी से बुनी गयी , मजबूत कथ्य और सुपरिचित विधा से रचना एक सादगीपूर्ण किन्तु उल्लेखनीय प्रभाव छोड़ती है । रचनाकार को बधाई ।

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गांव के सबसे दक्षिण में स्थित उस दो आँगन वाले घर में वर्षों के बाद आज माँस बन रहा था. घर में चारों तरफ उल्लास का वातावरण था. बच्चे, बड़े सभी आनंदित थे, मानो कोई त्यौहार का अवसर हो. गरीब के घर में तो जिस दिन दाल भात और सब्जी बन जाये, उसी दिन पर्व हो जाता है और यहाँ तो बकरे का मांस ही बन रहा था.

मुख्य आँगन के दक्षिणवारी ओसारे में घर की रसोई बनती थी जो शाम में ओसारे से उतर कर आँगन में आ जाती थी. कभी पूरब दक्खिन के कोने का एक कमरा रसोई के लिए भी निर्धारित किया गया था लेकिन घर के बढ़ते सदस्यों की संख्या के कारण जब कमरे कम पड़ने लगे तो वह रसोई सबसे छोटी बहू के कमरे में तब्दील हो गयी थी. घर के पश्चिम में आमों का एक बगीचा था जिसकी छाया शाम में आँगन को अपने आगोश में ले लेती और आँगन से उठता चूल्हे का धुआं कुछ जल्दी ही रात के आगमन की सूचना दे देता था.

घर में माँस बनने की ख़ुशी से उत्पन्न उत्तेजना में बच्चे दोपहर से ही उधम मचाये हुए थे. घर के बड़ों ने जब उन्हें डांट कर भगाया तो वे बगीचे में शोर मचाने लगे.

गुमानी काकी सबसे ज्यादा उत्साहित थी. वह याद करती तो उसे याद नहीं आता कि कब पिछली दफा इस घर में माँस बना था. वह इस घर में जब से ब्याह कर आई थी न जाने कितने पर्व त्यौहार उसने सूखी रोटी और नमक के साथ गुजारी थी. उसके मायके में खेती बारी तो नहीं थी पर पिताजी जंगल विभाग में सिपाही थे और भगवान की दया से खाने पीने की कभी कोई कमी नहीं रही थी. गुमानी काकी अपने बच्चों को अपने बचपन की कहानी सुनाती और रोमांचित हो जाती थी. बचपन में उनके पिताजी को जिस दिन वेतन मिलता था, उस दिन वह टोकरी भर के जलेबी लेकर आते थे. ताड़ के पत्तों से बनी टोकरी में लाल लाल करारी जलेबियाँ. जलेबियाँ इतनी ज्यादा हो जाती थी कि खाने के बाद बची जलेबियाँ गौ माता को खिला दी जाती थी. पर हाय रे किस्मत ! यहाँ आकर तो जलेबी का स्वाद भी भूल गयी. उसे जब पहला बच्चा होने वाला था तब रोटी के साथ चीनी खाने के लिए वह कितना तरसती थी. गुमानी काकी यह सब कहते हुए रोने लगती “न जाने क्या पाप किया था कि यहाँ ब्याह दी गयी”?

गुमानी काकी का ससुराल एक भरा पूरा संयुक्त परिवार था. यह परिवार पूरी तरह से खेती पर निर्भर था. खेती कम थी और घर में सदस्यों की संख्या ज्यादा. मुश्किल से ही साल भर का अनाज जुट पाता था. फिर उसी अनाज से न्योता-पिहानी, रोग- बीमारी सब देखना पड़ता था. वैसे तो भाग्य हर किसी की जिंदगी में अपनी दखल देता है परन्तु किसानों की जिंदगी हमेशा भाग्य भरोसे ही रहती है. कभी सूखा तो कभी बाढ़ और जब सब कुछ ठीक हो जाए तो उस साल अनाज के दाम नहीं मिलते.

गुमानी काकी का घर वैसे तो मिट्टी और छप्पर का ही था, पर था काफी बड़ा. दो आँगन वाला घर जिसमें अनेक कमरे थे. इस घर में गुमानी काकी के पति के अपने भाइयों के परिवार के अलावे चचेरे भाइयों के परिवार वाले भी रहते थे. इसके अलावे ननदें, सास, ससुर सब थे. बड़े से आँगन के चारो तरफ ओसारा था एवं उसके बाद कमरे.

इसी घर के उत्तरवारी ओसारे से लगा बीच वाला कमरा गुमानी काकी की गोतनी कलावंती का था. कलावंती टीबी से पीड़ित थी और अब उसकी बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी. सब हार मान चुके थे. अब मौत ही उसका इलाज था. सब कहते “कलावंती भाग्य हीन है.” जब से वह ब्याह कर आयी है उसने बहुत दुःख देखे. इसी दौरान उसने दो पुत्रों को भी जन्म दिया. न कभी पाव भर दूध नसीब हुआ न तन पर अच्छा कपड़ा . अब जब पति को सरकारी नौकरी लग गयी और सुख देखने का समय आया तो बेचारी मरणासन्न है.

कलावंती के पति रामेश्वर सरकारी विभाग में क्लर्क लग गए थे। आज रामेश्वर को पहला वेतन मिला था और उसी ख़ुशी में घर में बकरा कटा था. परिवार के सदस्यों के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था. रामेश्वर के बड़े भाई सिधेश्वर कह रहे थे कि वे तो यह भी भूल चुके हैं कि माँस का स्वाद कैसा होता है।
कई सदस्यों ने दिन का खाना भी यह सोच कर नहीं खाया था कि रात में माँस के साथ भात दबाकर खायेंगे .

दोपहर के बाद से ही घर के सारे सदस्य व्यस्त थे . कोई प्याज काट रहा था तो कोई मसाला पीस रहा था. बच्चे आज कुछ ज्यादा ही उत्साहित होकर खेलने में व्यस्त थे . इस उत्साह के माहौल में कलावंती की ओर किसी का ध्यान नहीं था. वैसे भी कलावंती चुपचाप बिना खिड़की वाले अपने अँधेरे कमरे में पड़ी रहती थी. बीच बीच में उसकी खाँसी और कराहने की आवाज से ही उसके होने का अहसास होता था। सुबह शाम कोई जाकर खाना पानी दे आता था.

रामेश्वर अपने सगे एवं चचेरे भाइयों के साथ ओसारा में हीरो बने बैठे थे. सभी भाई उन्हें घेर कर ऐसे बैठे थे जैसे वह कोई विशिष्ट मेहमान हों . रामेश्वर जी भी अपनी विशिष्टता अनुभव करके प्रफुल्लित हो रहे थे .

गुमानी काकी सारी तैयारी में सबसे आगे बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. उसने तो यहाँ तक कह दिया कि उससे बेहतर माँस इस घर में कोई बना ही नहीं सकता है. अपने पिता जी के घर में तो वह हर सप्ताह मांस बनाया करती थी.

रात के आठ बजे से खाने का दौर शुरू हुआ. सबसे पहले घर के मर्दों को अवसर मिला. गुमानी काकी की छोटी बेटी अनीता ने पहले खाने की जीद की, जिसपर उसे यह कह कर झिड़क दिया गया कि पहले घर के कमाने वाले मरद खायेंगे तब किसी को खाना मिलेगा .

मरदों ने डटकर खाया. घर के मर्दों के पेट भर जाने के बाद बच्चे खाने पर टूट पड़े. घर के बच्चों में कई तो ऐसे थे जिन्होंने अपने पैदा होने के बाद से कभी मांस चखा ही नहीं था.

बच्चों के बाद औरतों की बारी आयी. गुमानी काकी की छोटी ननद पार्वती ने बर्तन देखकर मुंह बनाते हुए कहा कि “इसमें तो अब बस झोर ही बचा है मांस तो है ही नहीं, हम लोग क्या झोर खायेंगे” ?

गुमानी काकी ने बर्तन में डब्बू घुमाकर अंदाजा लगाया और कहा कि अभी इसमें माँस के कुछ टुकडे बचे हैं.

पार्वती ने मुंह फुलाते हुए गुमानी काकी से कहा : “बचे हैं तो पहले मुझे दे दो” .

गुमानी काकी ने दरिया दिली दिखाते हुए उसे पहले खाना परोस दिया. घर के सभी लोगों के खा लेने के बाद महिलाएं ही बची रह गयी थी, जिसमे गुमानी काकी एवं उसकी गोतनियाँ शामिल थी. इस बार जब गुमानी काकी ने बर्तन में डब्बू घुमाया तो उन्हें साफ़ साफ़ अहसास हो गया कि मांस का एक भी टुकड़ा अब बचा नहीं है . बर्तन में खाली झोर ही शेष रह गया है .

“जाने दो सारा स्वाद तो झोर में ही होता है और पौष्टिकता भी” गुमानी काकी ने स्वयं को भी समझाया एवं घर की अन्य महिलाओं को भी, जो अभी भी खाने के इंतज़ार में थी.

अभी महिलायें अपने लिए चावल और झोर परोस ही रही थी कि गुमानी काकी की ननद पार्वती उधर से दौड़ती हुई आयी और हांफते हुए कहा “कलावंती भौजी मर गयी”.

“चुप चुप चुप” गुमानी काकी ने हाथों से इशारा करते हुए कहा एवं निरपेक्ष भाव से तेजी से खाना परोसने लगी.

थोड़ी देर बाद गुमानी काकी के विलाप से वातावरण गूँज उठा. महिलाएं खाकर उठ चुकी थी, वे भी संग में जोर जोर से कलावंती का नाम लेकर रोने लगी. ज्यादा खा लेने के कारण अलसाये हुए मर्द जो दांतों में फँसे मांस को नीम के खेर से निकालने में व्यस्त थे, भागे हुए आये … सिधेश्वर जी ने पान की पीक फेंक कर गला साफ़ करते हुए कहा “चलो कम से कम सबके खाना खाने के बाद मरी, पहले मर जाती तो ………”. जूठे बर्तन में मुँह लगायी हुई बिल्ली इतना शोर गुल सुनकर भाग खड़ी हुई. घर में शोक का एलान हो चुका था.

नीरज कुमार नीर April 08, 2017 at 01:11AM

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