°° पेपरवेट °°

रोज की तरह ऑफ़िस से लौटते समय उसनें सदर बस अड्डे से बस पकड़ी। आज़ बस में कुछ ख़ास भीड़-भाड़ नही है। कुछ मिनटों में अगला स्टॉपेज आ गया। इस स्टॉपेज से कुछ लड़के-लड़कियों का ग्रुप बस में चढ़कर उससे बिलकुल आगे की सीटों पर आ जमा। कभी वे चिल्लाते तो कभी वे आपस में हँसी-मज़ाक करने लगते।उनकी एक सी यूनिफॉर्म से लगता था कि वे किसी कम्पनी में काम करते हैं। उत्सुकतावश वह उनकी ही तरफ़ देखने लगा।
लड़को की शर्ट की जेबों पर एम्ब्राइडरी से “आर. एस..एंटरप्राइजेज” उकेरा हुआ है। लड़कियों की शर्ट का रंग तो लड़को की शर्ट जैसा ही है पर उस पर कोई एम्ब्राइडरी नहीं है। शायद वे सब आर.एस नाम की किसी कम्पनी में काम करते हैं।
अपनी-अपनी सीटों पर कुछ देर सुस्ताने के बाद वे सब आपस में चहकने लगे। उसने भी खिड़की से उस पार झांकना शुरू कर दिया। बारिश अभी आधा घण्टा पहले ही रुकी है। आसमान धुला-धुला सा है और बाहर का नज़ारा धानी साफ़े में लिपटा हुआ है। हालाँकि धानी रंग उसका फेवरिट रंग है,पर आज़ यह उसकी नज़रों में चुभ रहा था। उसने आँखे बंद करके सीट पर सिर टिका लिया। उन लड़के-लड़कियों की बात-चीत उसके कानों में अभी भी पड़ रही है।
“यार तू डेल्ही में क्यों नही ट्राई मारता?” उनमे से एक लड़के ने दूसरे के कंधे पर धौल जमाते हुए कहा। ” यस निखिल ! यू शुड गो फॉर इट.” चिप्स का पैकेट फाड़ते हुए लड़की भी चिहुँकी।
” अगर आगे बढ़ना है तो एक खूँटे से नही बंधना चाहिए खुद को।” एक दूसरे लड़के ने उन दोनों की बात की वक़ालत की। उनकी बातों को सुन उसने आँखे खोल लीं। न जाने क्यों वह भी निखिल का ज़वाब जानना चाहता है। निखिल के चेहरे पर एक साथ कई ज़वाब उगते है फ़िर फौरन ही मुरझा भी जाते है। निखिल कुछ बोले, इससे पहले ही बस हिचकोले के साथ रुक गई। लड़के-लड़कियाँ झटपट उतरने लगे। उसके जी में तो आया कि वह निखिल को रोक कर पूछ ले उस सवाल का उत्तर । पर मन मसोस कर वह चुप ही रह गया। बस अगले स्टॉप की तरफ़ बढ़ चली। अगला स्टॉप ! जहाँ उसे भी उतरना है।
कुछ दूर चलते ही ,अचानक बस झटके के साथ रुक गयी । आगे शायद रास्ते पर कोई पेड़ धराशायी हो गया है। दूसरे झटके के साथ ड्राइवर बस को बैक गियर में चलाने लगा। शायद ड्राइवर बस को अब दूसरे रास्ते से ले जाएगा। बस के साथ-साथ वह भी अतीत में लौटने लगा।
उसे इस कम्पनी में काम करते हुए कई वर्ष बीत चुके थे ,इस बीच उसके अधिकतर मित्रों ने कई-कई कम्पनियाँ बदल ली थी । वे उसे भी समझाते कि प्रोफेशनलिज्म का जमाना है कुछ नही रखा इस लॉयल्टी में , पर वह हमेशा हँस कर टाल देता। ऐसा न था कि अन्य कम्पनियों से उसे अच्छे ऑफर नहीं मिलते थे ,पर इस कम्पनी से उसनें अपनें कैरियर की शुरुवात की थी ; तो एक लगाव सा था। उसकी दक्षता एवम् दूरदर्शिता से कम्पनी को कई महत्वपूर्ण सफलताएं मिलीं , पर कभी उसनें अन्य सहकर्मियों की तरह इसका ढिंढोरा नही पीटा। वह इसे कम्पनी के प्रति अपना दायित्व समझता।

लेकिन आज़ की क्वार्टर रिव्यू मीटिंग में उसे बहुत तकलीफ़ हुई, जब उसे दरकिनार करते हुए कम्पनी ने उसके उस जूनियर सहकर्मी को उससे ऊँचे ओहदे पर पुनर्नियुक्त कर लिया जिसने कुछ महीने पहले यह कम्पनी छोड़ ,एक दूसरी प्रतिद्वन्दी कम्पनी ज्वाइन कर ली थी। झटका लगने से वह अतीत से वापस वर्तमान में वापस आ गया। स्टॉप आ गया था। बस तो रुक गयी , पर उसके दिमाग़ की उधेड़बुन रुक ही नही रही है।उसने लम्बे-लम्बे क़दम भरने शुरू कर दिए। वह जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता है।
घर पहुँचते ही अपनी परेशानी साझा करने के लिए जब उसने अपने छुटपन के दोस्त को फोन लगाया तो वह उल्टा उसी के ऊपर बरस पड़ा।
“कितनी बार समझाया तुझे कि प्रोफेशन में इमोशन नहीं चलता । पर तू माने तब ना.. ।हट्टे-कट्टे दिमागदार इंसान हो तुम! कोई बेज़ान चीज़ तो हो नहीं ,जो इतने बरसों तक एक ही जगह पड़े हुए हो। थोड़ा इधर-उधर भी हिलना सीखो। इतना अच्छा ऑफर था उस कम्पनी में , और तुमने वह भी ठुकरा दिया। पता है कितना ऑकवर्ड फील हुआ मुझे । और सुनो ! तुम चाहे कितना भी कर लो , बगैर झटके दिए मैनेजमेंट तुम्हारी कद्र नही करेगा।”
दोस्त का फ़ोन डिस्कनेक्ट होने के बाद सामनें की दीवार पर लटकी घड़ी की घण्टे वाली सुई अब तक कई पड़ाव पार कर चुकी है। पर दोस्त के कहे शब्द उसके दिमाग़ में वहीं ठहरे हैं।
वह दोस्त की सलाह से सहमत नही है। पर फिर भी अज़ीब सी उलझन है उसके दिमाग में। “क्या वाकई मैं किसी बेज़ान चीज़ में बदल रहा हूँ? सोचते ही अनायास ही वह पेपरवेट उसकी आँखों के सामने लट्टू सा नाचने लगा।
जब भी वह डायरेक्टर के केबिन में किसी काम से गाहे-बगाहे बुलाया जाता, तो उसकी नज़र अक्सर उनकी मेज़ पर कई बरसों से मौजूद उस काँच के पेपरवेट पर जा चिपकती, जो कागजों के पुलिन्दों के पैताने बेपरवाही से पड़ा रहता है। मटमैले से पारदर्शी काँच के गोले के भीतर कई रंग से आकृतियाँ कुछ यूँ उकेरी हुई है, जैसे साबुन-पानी के बुलबुले पर गिरती रोशनी अपनी किरणों की सलाइयों से हर बार नया कसीदा काढ़ देती है। कई बरस का हो जाने के कारण अब उसके काँच की चमक फीकी पड़ गयी है। इसीलिए अब वह मटमैला दिखाई देता है। हालाँकि डायरेक्टर की, महंगे टीकवुड की मेज़ पर चटक लाल, सुआपंखी रंगदार प्लास्टिक की क्लिपें, महंगे फोल्डर केस, उनके बेटे द्वारा यूरोप से लाए हुए पेन स्टैण्ड भी हैं, पर हर दो-चार महीने में ये सामान बदल जाया करते हैं। कभी प्लास्टिक की क्लिपों का तबादला कर उनकी जग़ह स्टील की नक्काशीदार क्लिपें ले लेती है तो कभी पेन स्टैंड की जग़ह उनकी बेटी के द्वारा स्विट्जरलैंड से भेजी गयी डिजिटल घड़ी विराजमान हो जाती है। फोल्डर केसों के ब्रांड तो हर पखवाड़े ही बदल जाते। पर एक चीज़ जो नही बदलती है, वह है यह पेपरवेट …। जिसे उनकी मेज़ पर जग़ह तो हमेशा मिली है ,पर तरज़ीह ? शायद ही कभी।

ओह !, क्या उस पेपरवेट की तरह वह भी अपनी अहमियत खो चुका है?’ सोचते हुए उसने ठंडी सांस ली। उसे खुद पर इतना गुस्सा आ रहा था कि अगले दिन ही नौकरी से इस्तीफ़ा देकर , सब कुछ छोड़-छाड़ कर कुछ दिन के लिए कहीं दूर निकल जाए। इसी उधेड़बुन में उलझकर करवट बदलते हुए न जाने कब उसकी आँख लग गयी वह जान ही न पाया।

सुबह अपने नियत समय पर वह दफ़्तर पहुँच गया। रोजमर्रा का नियमित काम निपटाया और फिर डायरेक्टर के कक्ष में जा पहुंचा। उसके हाथ में एक लिफाफा भी था।

“आइए।” डायरेक्टर ने बैठने का इशारा किया।
उसने लिफ़ाफ़ा सामने मेज़ पर रख दिया आदतन बैठने से पहले उसने नजरों से सारी मेज़ टटोली पर यह क्या? आज़ पेपरवेट अपनी जग़ह पर नही है।
“कहिए।” डायरेक्टर ने चश्में के नीचे से उसके लिफाफे पर नजर डालते हुए कहा। “इसमें क्या है?” ज़वाब में वह चुप रहा, जैसे कुछ कहने की भूमिका बना रहा हो। डायरेक्टर भी उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। तभी डायरेक्टर अकस्मात चिहुँके, “अरे एक बात तो मैं आपको बताना ही भूल गया। कहते हुए उन्होंने जैसे ही कागज़ के पुलिंदे को क्लिप से दबाने का प्रयत्न किया चटाक की आवाज़ के साथ क्लिप दूर जा गिरी उसकी स्प्रिंग छिटक कर टूट चुकी थी। कागज़ इधर-उधर छितरा गये । डायरेक्टर ने फौरन बेल दबाकर चपरासी को बुलाया ।
“क्यों रामदीन पेपरवेट कहाँ है?”
“सर! मुझे लगा वह बेकार है। आप उसका इस्तेमाल ही कहाँ करते हैं।”
“बेवकूफ़ ! उसे फौरन लाओ। यह क्लिपें उतनी ड्यूरेबल नही होतीं हैं।” डायरेक्टर रामदीन पर झल्ला उठे। सहमा हुआ रामदीन आंधी की तरह स्टोर की तरफ़ भागा। डायरेक्टर ने फड़फड़ाते कागजों को अपनी हथेलियों से दाबते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई ” मैनेजमेंट नें आपको प्रमोट करने का फ़ैसला किया है और अब आप इस कम्पनी के डिप्टी मैनेजर होंगे।”

इस अत्यप्रत्याशित घटना से वह चौंक गया। उसे समझ नही आया वह क्या उत्तर दे। इसी दौरान रामदीन पेपरवेट को झाड़-पोंछ कर चमका लाया। उसे देखते ही उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा ” आपका पेपरवेट !” डायरेक्टर उसकी तरफ़ घूरने लगे। उन्हें अपनी तरफ़ घूरते हुए देख, झेंप कर वह फौरन पलटा और बाहर चल दिया।

डायरेक्टर ने उसे टोका,” अरे, यह लिफ़ाफ़ा तो लेते जाइए,अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।”

“जरूरत है सर..इसमें वो नहीं है, जो आप समझ रहे हैं।” उसने पलटकर कहा।
“तो फिर क्या है ? ” डायरेक्टर के चेहरे पर बड़ा सा प्रश्नचिन्ह लटक गया। उनकी हथेलियों से दबे कागज़ फड़फड़ा उठे।

“इसमें मेरे नए प्रोजेक्ट का अप्रूवल लेटर है। कल ही क्लाइंट ने स्वीकृत किया है। कल मीटिंग में आपको बताना भूल गया था।” उसने मुस्कराते हुए डायरेक्टर की आँखों में आँखे डालते हुए कहा। और डायरेक्टर के हाथों के नीचे दबे कागजों को आहिस्ता से निकाल कर उस पेपरवेट के नीचे मज़बूती से दबा दिया।डायरेक्टर भौचक्के से उसे ताकने लगे। उन्हें समझ नही आ रहा था कि वह क्या कहें।
वह अपनी जग़ह से उठा और डायरेक्टर के केबिन से बाहर निकल आया। दरवाजे से बाहर निकलते हुए उसने देखा कि डायरेक्टर उसी पेपरवेट को अपनी हथेली पर रख कर निहारते हुए मुस्कुराते जा रहे हैं, और हतप्रभ रामदीन अपना सिर खुजलाते हुए उनकी इस मुस्कुराहट का कारण बूझने की कोशिश कर रहा है।

सुधीर द्विवेदी April 08, 2017 at 09:51AM

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