उल्लेखनीय रचनाओं की कड़ी में कहानी ‘संदेसे आते हैं’ .. कहानी चुस्त शैली में संवादों के माध्यम से चलती है और बिम्ब बिखेरती है । किन्तु कहानी में नैरेशन का अभाव खटकता है । भावप्रवणता कहानी में रेखांकित किये जाने योग्य है ।

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‘की होया कुलजीते, मुँह क्यूँ उतरया है तेरा, सुरजीत केहन्दा सी तू रोटी वी नई खादी’
‘कुश नही वीरे, बस ऐवें ई’
‘ओये दस्स वी हुण, वीर आख के गल लकोना ए’
‘की दस्सा यार, फँस गये इस देशभक्ति के चक्कर में, 3 महीने हो गए यहाँ आए पर छुट्टी नहीं मिली फिर से, जब तक बेरोजगार था, लगता था कोई भी काम मिल जाए बस, लगता था पैसा ही सब कुछ है, पैसे के लिए कुछ भी करूँगा, जब सर्विस मिली तो लगा जैसे सब पा लिया,और चाहिए भी क्या,ट्रेनिंग में खूब हड्डियाँ तुड़वाई पर हिम्मत न छोड़ी, यूँ भी तो लग रहा था की देशभक्त कहलाने के पैसे और कहाँ मिलेंगे , पर….’
‘पर क्या ?’
‘पर पैसा सब कुछ नहीं होता यार, अब लगता है इससे तो अच्छा मजदूरी करके गुजारा करता, कोई रेहड़ी लगा के सब्ज़ी बेचता तब भी अच्छा रहता, पैसा किसके लिए कमाते हैं सब लोग? परिवार के साथ ख़ुशी से रहने के लिए ही न ,पर हम तो उसी परिवार से दूर हैं, और हम क्या यहाँ जी भी रहे हैं? जानवरों से बदतर जिंदगी है हमारी, 18000 फुट की ऊंचाई, चारो और बर्फ, अगर चलना भी पड़े तो 2 फुट बर्फ में पैर धँस जाते हैं, -40℃ साली इतनी ठंड में कोई घर तो क्या रजाई से बाहर न निकले पर हम लोग भटकते रहते हैं, उल्लू की तरह आँखे फाड़ते हैं कि कोई आ न जाए, 3 महीने हो गए इंसान तो क्या चिड़िया की शक्ल नहीं देखी। ये जिंदगी भी कोई जिंदगी है, सूअर की तरह बंकर में पड़े रहो, जहाँ 24 घँटे घासलेट जलाना जरूरी है, चेहरे पर इतना कार्बन जम गया है कि खुरच दूँ तो 4 डिबिया काजल निकले। और कुछ नहीं तो कभी तो अच्छा खाना मिले, कम्बख्त पैक्ड खाना खा खा के गला छील गया है। शुक्र है कि कम से कम ये रेडियो तो चलता है वरना जिंदा होकर भी मुर्दा जैसे हो जाते। ‘
‘हाहाहा, ओये तू इतना भरा बैठा है? अच्छा किया जो बोल दिया, भार हल्का हो गया न। तू छोड़ ये सब, पता है पंजाब में जमीन का क्या रेट है?’
‘????’
‘हाहाहा, मैं दसना ना, 15 से 20 लाख एक किले दे, ते यारां कोल पुरे वी (बीस) किले आ ���� हाहाहा, तुम्हे क्या लगता है सब यहाँ पैसे के लिए आते हैं �� ओये यारा कई बातें होती हैं जो सिर्फ मसूस करी जाती हैं, पता है जब मेरे बाऊजी शहीद हुए थे मैं बहुत छोटा था, किसी को खोने का दुःख नहीं जानता था पूरा गाँव इकट्ठा हुआ था, हर एक आँख में आंसू, औरों को रोते देख मैं भी रोने लगा था, पर मेरी बेबे ने कहा पुत्त तू नहीं रोना, मेरा शेर पुत्तर, अपने बाऊजी जैसा बनना। समझ नही सी आया बेबे खुद रो के मेनु क्यों चुप करा रही सी, क्यों मुझे बाऊजी जैसा बनने को कह रही थी। पर फिर जब लोग मुझे शहीद मेजर अमरजीत सिंह का पुत्तर बोल के सम्मान देते तो समझ आता की बाऊजी ने क्या कमाया, रब्ब दी सौं छाती गर्व से चौड़ी हो जांदी। ये गर्व बड़ी कुत्ती चीज है, जिस दिन इसका मोल समझ लेंगा ये रोटी शोटी बर्फ शरफ़ दी गलां फुद्दू लगेगी तेनु।��, चल तेरा मूड बनाइए, आ फड़ तेरे घर से चिट्ठी आई है’
‘सच्ची ? तो यार दी क्यों नहीं अब तक��’
‘तरसाने दा अपना मज़ा है काके����������’
कुलजीत चिट्ठी पढ़ने लगा,
‘प्यारे बेटे कुलजीत, रब्ब तेरी वड्डियाँ उमरां करे। हम सब यहाँ कुशल हैं, रब्ब से तेरे लिए मैहर चाहते हैं। कई दिन हुए तेरी बहन से चिट्ठी लिखने को कह रही थी, पर तू तो जानता ही है कितनी आलसी है ये , आज जबरदस्ती पकड़ के लिखवा रही हूँ, बूढी हो गई हूँ तबियत थोड़ी ठीक नहीं रहती पर तू चिंता मत करना मैं दवाई ले रही हूँ, बेटा एक खुशखबरी भी है हमारा पीछा इस आलसी से जल्दी ही छूट जाएगा, हाँ रिश्ता पक्का कर दिया तेरी बहन का, खुश हो न ? जब तुम आओगे तो शादी की तारीख भी रख लेंगे, पहले इसकी फिर तेरी, तब मैं तो निहाल हो जाऊंगी। हो सके तो जल्दी आना बेटा, बड़ी याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारी माँ’
कुलजीत की आँखों में आँसू थे, ख़ुशी के या गम के वो खुद नहीं जानता। उसके हाथ से चिट्ठी लेकर गुरविंदर पढ़ने लगा फिर बोला, ‘बल्ले नी तेरे, भैण दा व्याह, मुबारकां बई मुबारकां। ओये हुण तां खुश होजा कंजरा।������’
‘हाँ यार, खुश ही तो हूँ’ आँसू पोंछते हुए कुलजीत बोला। ‘तेरे घर से नहीं आई कोई चिट्ठी?’
‘ओये हमको कौन याद करता है ��, चल तुझे इस खुशखबर के लिए रम पिलाता हूँ, और सुन अब नखरे ना करीं, नहीं तो लपेड़े भी खाएगा।’
दोनों इस पर कहकहा लगा कर हँस पड़े।
***
‘ओये बलवंते, गुरी नई आया अबी ?’
‘ना पाजी, पर आप का काम बड़ा फ़ास्ट है, छेती मुड़ आए?’
‘कित्थे रह गया ओ कंजर, मौसम भी खराब हो रहा है’
‘पूरी पेट्रोलिंग टीम बाहर है पाजी, आ जाण गे, फिकर ना करो।’
‘ओये फौजियों की फिकर तो उनके घरवालों के अलावा कोई नहीं करता, खुद फौजी भी नहीं। ‘
बर्फ में बनाए एक बंकर में कुलजीत बैठा था, फिर सहसा एक शरारत के चलते गुरविंदर का सामान टटोलने लगा, एक चिठ्ठी हाथ लगी तो पढ़ने बैठ गया।
‘गुरविंदर वीर जी, सत श्री अकाल। आपसे छोटा हूँ इसलिए माफ़ करना जो लिख रहा हूँ, बहुत कोशिश की कि कुछ अच्छा लिखूं पर इससे अलग कुछ नहीं आया दिल में, आप इतना गिर जाओगे सोचा न था। देश देश देश हर बात में यही घुसा रहता है आपके। बेटे का एक्सीडेंट हुआ पर आप तब आए जब वो जा चुका था। छुट्टी नहीं थी का बहाना सुपरहिट है आपका, माँ आपको सबसे ज्यादा प्यार करती थी जब भी कभी कोई बात चलती उसकी आँखों में आपके नाम के साथ गर्व के आँसू छलछला जाते, पता है आज वो माँ मर गई हस्पताल में उडीक करते करते पर आप नहीं आए, पूछूँगा भी नहीं की इस बार क्या बहाना बना रहे हो। बस बताना है आपको की भाभी की आँख से एक आँसू तक नहीं गिरा, काकू के जाने के बाद भी तो यही हुआ था तब भी पथरा गई थी बिलकुल पर आपको देखते ही फट पड़ी थी। मुझसे उनकी ये हालत देखी नहीं जाती,बहुत हो गया और कितना खोना बाकि है वीर जी। तुहानु रब्ब दा वास्ता, हो सके तो जल्दी चले आओ।
आपका भाई
गुरजोत सिंह।
कुलजीत की आँखों में आँसू थे, सोचने लगा इतना सब सहने के बाद भी कोई मुस्कुरा कैसे सकता है, चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, ये गर्व आखिर है क्या बला। चिठ्ठी वापस सामान में रख बंकर से बाहर आया। गुरविंदर अभी भी नहीं आया था।
‘बलवंते मैं आता हूँ अभी गुरी को देख के’
***
‘मर गया शाब, बौत बर्फ गिर गया शाब एकदम, सब दब के मर गया शाब। चीख भी नहीं निकला ,मी कैसे बच गया नहीं पता। उ शब दबा पड़ा है बेचारा।’
तलाशी में 10 लाशें मिली थी जिनमे गुरविंदर और कुलजीत के शव भी थे।
***
सेना की किसी और यूनिट में किसी और जगह कुछ फौजी रेडियो सुन रहे है, काश उद्घोषक एक बार बस एक बार उनका नाम भी पुकार दे इस आशा से कान और ध्यान लगाए।
फौजी भाइयो अगला गाना है फिल्म बॉर्डर से, संगीत दिया अनु मलिक ने और आवाज़ें है सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की, पसन्द किया है आप सब ने, जम्मू से लांस नायक गुरविंदर सिंह, कुलजीत सिंह, सूबेदार प्रभजोत सिंह……………………..।
गाना बज रहा है,
‘संदेसे आते हैं
हमे तड़पाते हैं,
के चिट्ठी आती है,
जो पूछे जाती है
के घर कब आओगे।’
इस यूनिट से दूर बहुत दूर पंजाब में कुछ जोड़ी आँखे छलक उठी हैं, उदघोषक ने जाने अनजाने उन्हें उनके किसी खोए हुए अपने की याद दिला दी थी।

— अरुण राजपुरोहित April 08, 2017 at 10:18AM

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