इस कहानी में संवाद योजना का बेहतरीन संयोजन किया गया है । कहानी यथार्थ , यथातथ्यता और कल्पना का संयोजन होती है । प्रस्तुत है तीसरी उल्लेखनीय कहानी ‘नैना’।


“नैना”
“इतनी जल्दी……..आःह्ह.. इतनी जल्दी कैसे उठ गये?” नैना ने जम्हाई लेते सवाल दागा। अमूमन समीर दस बजे भी सोता रहता था. फिर उठता था तो सबसे पहले नैना को चाय पिलाता था.
“आज मुझे जल्दी जाना है बेब?” समीर ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया।
“कहाँ जाना है? खैर, वो बाद में बताना पहले चाय पिलाओ”
“सॉरी स्वीट हार्ट… मैं लेट हो जाऊंगा। तुम आज खुद बना लो न” समीर ने टका-सा जवाब दिया।
“व्हाट डू यू मीन लेट हो जाऊंगा? तुमने कौन सी ड्यूटी करनी है?”
“अरे तो थिएटर तो जाना है न? आज प्ले की रिहर्सल मोर्निंग टाइम में हो रही है डिअर।”
“सो व्हाट? थोड़ी लेट चले जाना, मेरी सौत कुछ देर इंतज़ार कर लेगी।”
“ओफ्फो, कोई सौत वौत नहीं है यार, बल्कि तुम्हे भी आना चाहिए देखने.. इट विल बी इंटरेस्टिंग फॉर यू आल्सो”
“शटअप, एक चाय पिलाने में इतने नखरे.. जितनी देर में बहस की है उतनी देर में चाय बन जाती”
“मे बी यू आर राईट, इतने देर में तो आप चाय बना भी लेती मिसेज समीर, मैं चलता हूँ मेरे पास टाइम नहीं है।” इतना कहते ही समीर ने गाड़ी की चाबी उठाई और निकल गया।
नैना अवाक् उसे जाता देखती रही, ‘चाय बनाने के लिए रसोई में गयी पर सारा ध्यान समीर पर लग गया। ‘ऐसा क्यों किया उसने?’ एक ही सवाल बार बार खुद से पूछने लगी।
फिर अपने दोस्त ‘संजय’ को कॉल मिलाई। फ़ोन तुरंत उठा।
“हाउ आर यू स्वीट हार्ट?”
नैना ने आपबीती सुना दी!
“किसी दूसरी का चक्कर तो नहीं नैना?” सब सुनकर संजय बोला!
“अरे नहीं नहीं, वो ऐसा नहीं कर सकता”
“देख उसका सुबह इतनी जल्दी जाना भी तो नहीं हो सकता था”
“यार तू उलझा मत, ये बता क्या करूँ?”
“तलाक दे दें”
“ओह शटअप यार, ये तो तू शादी के अगले दिन से ही कह रहा है।”
“अरे तो क्या गलत कह रहा हूँ, वो है ही नहीं तेरे लायक।”
नैना झल्ला गयी “मैं.. मैं तुझे शाम को कॉल करती हूँ।” और लाइन काट दी।
फिर चाय बनाकर नहाने चली गयी। तैयार होकर आई पर चाय नहीं पी।
अपना बैग संभालकर पहली बार घर की चाबी ढूंढी. अब से पहले ये समीर की ज़िम्मेदारी थी.
एक बार और हसरत भरी निगाह चाय से भरे कप पर डाली और निकल गयी।
गाड़ी निकालते समय गाड़ी गैराज के शटर से लड़ गयी।
रास्ते में वो काफी देर तक अपनी गुज़री ज़िन्दगी के बारे में सोचती रही, उसकी फैमिली चाहती थी कि वो डॉक्टर बने, उसकी दुनिया तो थिएटर से बाहर ही नहीं निकल पाती थी। फ़िल्में देखना एक्टिंग करना ये सब उसका सपना हुआ करता था, पर घर वालों के आगे किसकी चलती है? उसने रशिया से एमबीबीएस किया। डॉक्टरेट कम्पलीट कर उसने कुछ दिन आराम से बिताने के लिए दिल्ली का रुख किया और एक थिएटर ज्वाइन कर लिया।
थिएटर में कभी रिहर्सल होती तो वो भी उसमें शिरकत करती। वो दिन तो उसे आज तक याद है जब उसका आठ मिनट का रोल था लेकिन वो पब्लिक को इतना नापसंद हुआ कि डायरेक्टर ने उसे थिएटर से निकाल देने की धमकी दे डाली थी।
तब उसे समीर ने डिफेंड किया था। समीर ने उसकी हिंदी सुधारने का आश्वासन देकर, डायरेक्टर का गुस्सा शांत किया था।
फिर हिंदी सुधारते-सुधारते वो दोनों बिगड़ गए. जाने कब बातों-बातों में दोनों इतने करीब आ गए कि फिर दूर न हुए।
गाड़ी चलाते-चलाते नैना के चेहरे पर स्माइल आ गयी। कैसे समीर ने ‘अरा से अड़ा’ बोलना सिखाया था.
समीर से शादी करने के लिए नैना को बाकायदा घर में झगड़ना पड़ा।
“आपके पिछले सपने को पूरा करने में मेरे पांच साल खप गए, अब आप सारी जिंदगी खपाना चाहते है?”
“बेटा पर हम चाहते थे कि…”
“पर मैं नहीं चाहती न…”
अंत-पंत नैना के समीर से शादी कर ली। लेकिन शादी के बाद से ही उसे थिएटर उबाने लगा, उसे जितनी मुहब्बत थिएटर से थी, उतनी ही ऊबियत होने लगी.
इसी ऊबियत से बचने के लिए उसने दिल्ली के नामी हॉस्पिटल में सर्जन बन कर प्रैक्टिस शुरू कर दी!
‘इस समीर के लिए मैं सबसे लड़ी वो आज मुझे एक चाय भी न पिला सका, शादी को डेढ़ साल हुआ नहीं कि इसने रंग दिखाने शुरू कर दिए.’
उसका समीर को सुनाने का मन किया, उसने कॉल लगाई पर लाइन बिजी थी
नैना को इतना गुस्सा आया कि उसने समीर का नंबर ही फ़ोन से डिलीट कर दिया।
तब तक हॉस्पिटल भी आ गया। सारा दिन सबसे झगड़ा करते गुज़रा।
शाम को फिर वो अपनी ही धुन में चल दी। उसे पता ही न चला की कब उसने एक जीप वाले को हलकी सी साइड मार दी और वो जीप उसके पीछे लग गयी जिसमें चार हट्टे-कट्टे सूरत से ही हफ्ता वसूली करने वाले लड़के बैठे थे।
हॉस्पिटल से कोई पांच किलोमीटर आगे जा कर एक रेड लाइट पड़ी। वहाँ उन मवालियों ने नैना की गाड़ी के आगे अपनी गाड़ी लगा दी। इत्तेफाकन चौराहे पर गिने-चुने वाहन थे।
पैसेंजर सीट वाला मोटा दढ़ियल आदमी हाथ में बियर लिए उतरा और नैना की गाड़ी की ड्राइविंग सीट वाले शीशे के सामने खड़ा हो गया।
तब जा कर नैना की नज़र उस पर पड़ी तो वो घबरा गयी। देखते ही देखते गाड़ी से दो और लड़के उतरे और नैना की गाड़ी के पास आ कर भद्दे इशारे करने लगे।
नैना चीखने लगी। बंद गाड़ी में उसकी आवाज़ घुट के रह गयी।
ड्राइविंग सीट के पास खड़े मोटे ने जबरन दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
“हे भगवती भवानी रक्षा कर” पर तब तक दूसरी साइड खड़े मुष्टंडे ने बोतल मार के गाड़ी का पिछला शीशा चटका दिया।
भड़ाक की आवाज़ से नैना की रही सही जान भी सहम गयी।

शाम को समीर बहुत खुश-खुश घर में घुसा. उसके प्ले में परफॉरमेंस देखने के बाद एक छोटे लेकिन नामी बॉलीवुड डायरेक्टर ने उसे अपनी फिल्म में चांस देने का वायदा किया था।
पर घर का हाल देख सारी ख़ुशी काफूर हो गयी। हर तरफ अफरा तफरी का बोलबाला था.
वो बेडरूम में घुसा, अँधेरे में उसे उकड़ू बैठी, सुबकती नैना दिखाई दी.
“क्या हुआ? नैन?”
नैना ने सर उठाया, समीर ने लाइट जला दी। नैना उठी और समीर से लिपट गयी।
“अरे… हुआ क्या?”
“तुम.. तुम… कहाँ थे” नैना ने अलग होते ही समीर की छाती पर एक घूंसा मारा।
“आह,,, अरे थिएटर था और कहाँ, तुम्हें क्या हुआ जान?”
“जान गयी तेल लेने” वो थोड़ा अलग हुई तो गुस्सा उमड़ पड़ा।
“और ये घर का क्या हाल बना दिया है?”
“आग लगे इस घर को”
“नैना” समीर चीखा।
“समीर… क्या समझते हो तुम खुद को?” नैना ने काउंटर अटैक किया।
मैंने ऐसा क्या दिया?”
“पूछते हो क्या कर दिया? फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे थे पहले ये बताओ?” नैना और भड़की।
“एक सुबह का फ़ोन नहीं उठाया बस, तुम्हे बता के गया था न कि सुबह रिहर्सल है, डायरेक्टर के साथ कांफ्रेंस पर था। लेकिन उसके बाद तुम्हें कितने फ़ोन किए तुमने देखा?“
“क्यों तुम्हे संजय ने दसियों फ़ोन करे की नहीं शाम को?” नैना ने उसका सवाल अनसुना कर दिया।
“मैं संजय का फ़ोन क्यों उठाऊ? मुझे उससे क्या मतलब? और तुम्हे उससे क्या मतलब? तुम्हें कहाँ मिल गया वो? एक मिनट के अन्दर बताओ क्या हुआ आज।”
“क्यों बताऊ तुम्हे? तुम्हे क्या फर्क पड़ता है?”
समीर ने नैना को अपनी तरफ खींचना चाहा पर नैना ने धक्का दे दिया।
समीर ने आहत निगाहों से देखा
“तुम्हे होश भी है अपने सिवा किसी का? मैं आज लौट रही थी तभी…” नैना ने सीन बाई सीन, सारा किस्सा बयान कर दिया। “फिर जब उसने बौटल रियर ग्लास पर मारी तो मैं बहुत डर गयी। मैंने माता वैष्णोदेवी को याद कर बैक गियर डाला और एक्सेलेरेटर दबाया कि पीछे खड़ा लड़का गिर पड़ा। फिर मैंने फर्स्ट गियर में गाड़ी आगे बढ़ा दी। उनकी जीप में हैण्ड ब्रेक नहीं लगा था, मेरी गाड़ी टच होते ही जीप रोड से उतर गयी। वो चारों जीप सँभालने भागे तो मैंने तुरंत गाड़ी उड़ा दी। हे भगवती, मैं ही जानती हूँ कि मैं कैसे आई हूँ सारे रस्ते पीछे देखते-देखते।”
“फिर?”
“फिर क्या मैंने रास्ते में संजय को कॉल लगाई, वो बोला की मैं उसके घर आ जाऊ, वहीँ से दोनों पुलिस स्टेशन चलेंगे”
समीर सर से पाँव तक सुलग गया। “मतलब उसके घर क्यों? वो क्यों न आया तुम्हारे पास?”
“वो.. उसके घर पर कोई था….. किसी के साथ था इसलिए”
“वो साला छड़ा, लावारिस, उसके घर कौन आ गया?”
“समीर प्लीज”
“शटअप.. इतना बड़ा काण्ड हो गया और तुमने मुझे कॉल करने की बजाए उस घर के भेदी को कॉल की? क्यों?”
नैना चुप हो गयी।
समीर भड़क उठा “नैना जवाब दो”
“क्योंकि मैं… क्योंकि मैं गुस्सा थी तुमसे… “
“सुबह चाय की बात से तुम इतनी गुस्सा थी की तुमने मुसीबत में भी मुझे न याद कर उस कमीने संजय को याद किया? ख़ुशी में न करती तो भी मैं मान लेता, पर मुसीबत में तुम्हे वो याद आया, हो ही नहीं सकता, सच बताओ क्यों किया ऐसा?”
नैना का सर झुक गया “क्योंकि मैंने तुम्हारा नंबर सुबह डिलीट कर दिया था.”
“हद होती है बचपने की” समीर ने माथा पीटा “और तुम्हें याद भी नहीं था?”
“न…”
“तो संजय से नंबर ले सकती थीं?”
“उसको क्यों बताती की तुम्हारा नंबर डिलीट किया है मैंने, और याद भी नहीं है?”
“उसको घर के झगड़े बता सकती हो, मेरी बुराई कर सकती हो पर खुद की गलती नहीं बता सकती।”
“समीर” नैना चिल्लाई “तुम मुझे ताने मार रहे हो? मुझ पर शक कर रहे हो?”
“हाँ मार रहा हूँ ताने, क्यों तुम्हे वो याद आया मैं नहीं?” समीर चिल्लाया.
“क्योंकि तुम्हें अपनी रंगरलियों से फुरसत जो नहीं है” नैना भी चिल्लाई।
“बस” समीर चिल्लाया और एक थप्पड़ नैना के गाल पर जड़ दिया।
फिर अप्रत्याक्षित घटना घटी।
नैना ने पूरी ताकत से एक तमाचा समीर के गाल पर रसीद दिया। थप्पड़ इतना तेज़ था कि समीर लड़खड़ा कर ज़मीन पर गिर पड़ा।
नैना खुद सहम गयी।
समीर का एक हाथ खुद-ब-खुद गाल सहलाने लगा। माहौल में एक असहनीय चुप्पी ने जगह घेर ली।
नैना को लगा शायद उसने कुछ ज्यादा ही जोर से मार दिया। पर समीर के पास जाने की हिम्मत न कर पाई।
समीर ने घूरा
नैना ने निगाह नीची कर ली।
समीर अनायास हँस दिया। नैना चौंकी ‘ये इसे क्या हो गया’
समीर ठहाके मार कर हँसने लगा और जमीन पर बैठे बैठे ही लोट गया। नैना भी जहाँ खड़ी थी वहीँ बैठ गयी और मुस्कुराते हुए बोली “क्यों हँस रहे हो इतना?”
“हाहाहा, ये सोच के हँस रहा हूँ कि एक दिन सुबह नाश्ता न कर के जाओ तो बीवी का तमाचा सहने की भी ताकत नहीं रह जाती”
“वैरी फनी” नैना मुंह बिगाड़ के बोली
समीर और जोर से हँसने लगा “यार कुछ भी कहो, थप्पड़ पड़ा बहुत सही था। हिला दिया मुझे ऊपर से नीचे तक”
“और तुमने जो मुझे मारा उसका क्या?” नैना समीर के पास आ कर बैठ गयी।
“उसी गलती पर तो हँस रहा हूँ, अगली बार हेलमेट पहन कर आऊंगा तुम्हे थप्पड़ मारने।”
नैना ने एक और मुक्का उसकी छाती पर जमाया “मैं तुम्हारा हेलमेट भी तोड़ दूंगी”
“हाहाहा, कितना अच्छा था आज मेरा दिन, और तुम्हारा उतना ही बुरा.. यार अबसे सुबह झगड़ा नहीं करेंगे, रात में आ के आराम से किया करेंगे”
“अच्छा जी, वैसे क्यों था दिन अच्छा?”
“मुझे फिल्म्स में काम मिल गया”
“अरे वाह वाह” नैना एक पल खुश होते ही अगले पल उदास हो गयी “इसका मतलब अब तुम मुंबई चले जाओगे”
“जी नहीं, अब ‘हम’ मुंबई चले जायेंगे” समीर ने मुस्कुरा के नैना की तरफ देखा।
नैना ने उसके होंठो से होठ मिला लिए। कितनी ही देर खामोशी रही।
आखिर नैना का मोबाइल बजने से दोनों अलग हुए।
संजय की कॉल थी।
समीर ने नैना की तरफ देखा। नैना मुस्कुराई और फ़ोन काट दिया। दोनों फिर से हँसने लगे।
“अरे सुनो, हमें पुलिस रिपोर्ट भी तो करानी चाहिए न?”
“हाँ बिलकुल, लेकिन उससे पहले एक काम करना चाहिए”
“क्या?”
“तुम्हे कपड़े चेंज करने चाहिए और मुझे चाय बनानी चाहिए।” इतना कहकर समीर किचन की तरफ बढ़ गया।

सिद्धार्थ अरोड़ा सहर April 08, 2017 at 10:24AM

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