शिव बहादुर सिंह के छोटे लड़के का विवाह था । बारात निकल चुकी थी पर उनके समधी बाबू लक्ष्मी नारायण सिंह नहीं आये थे । उनका कहना था की ऑर्केस्ट्रा जायेगा तो वह नहीं जाएँगे और बरातियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ऑर्केस्ट्रा तो जा रहा था पर अड़ियल ठाकुर नहीं ।
अपनी टाटा सफारी में तन कर बैठे भगीरथ पाण्डेय तनिक तुनक कर बोले इ का नौटंकी लगाये थे कि ऑर्केस्ट्रा नहीं जायेगा ! अरे इतना गज़ब की पार्टी लाएँ हैं इस बार कि क्या बताएँ…..! एक से एक कोरी-कोरी लड़कियाँ हैं । शामियाना उड़ जाये महाराज ऐसी आदा है । सीताराम तिवारी इतना सुनते ही बिगड़ पड़े थे; बोले ए पांडे जी; बिना जाने-बूझे कुछ मत बोला कीजिए । अपनी बेटी की उमर की लड़कियों का नाच देखने के लिए आपकी लार टपक रही है ! अरे राजा भगीरथ जैसा काम नहीं है तो बोलते वक्त खुद के नाम और ब्राह्मण होने का ही ख्याल किया कीजिए । जानते भी हैं लक्ष्मी बाबू ने क्यों इनकार कर दिया आने से ? इसी ऑर्केस्ट्रा ने लील लिया है उनकी जन्म भर की कमाई को !
भगीरथ सिटपिटा गए थे सुनकर कि बगल में बैठे दिनेश ने दबी जुबान से पूछ ही लिया कि ऐसा का हो गया पंडी जी जो बाऊ साहेब को एतना चिढ़ है ऑर्केस्ट्रा से ?
सीताराम बोले आदित्य नाम था लड़के का । यथा नाम तथा गुण, इकलौता बेटा और बाप की लाठी नहीं तोप कहिये तो ज्यादा सही होगा । मजदूर न मिलें तो माघ के ठार में गेंहू सींच दे और ड्राईवर न हो तो पूरा बाँध ट्रैक्टर से अकेले ही जोत दे । तब गाँव की सुबह बाबू लक्ष्मी सिंह के फ़ोर्ड 3600 की आवाज से होती थी । जहाँ बाकी ठाकुरों और पंडितो के लड़के अपनी जाति के गुमान में बाप के दम पर कालर झारे अय्याशी करते फिरते वह खलिहान निबार रहा होता और जब कुर्ता पहन तिलक लगाये अपनी काली बुलेट से निकलता तो कुँवारी क्या नव विवाहिताओं के दिल मचल उठते उसकी बुलेट की बैक सीट पर बैठने को ।
पट्टीदारों के सीने पर साँप लोट-लोट जाते उसे देखकर , लक्ष्मी बाबू अगर चन्द्र थे तो वह सूर्य ; पर न जाने क्यों विधाता रूठ गए और ऐसा रूठे की क्या कहा जाय !

लक्ष्मी सिंह के साले की बेटी की शादी थी । उनके ससुर बड़ी रंगीन मिज़ाज तबियत के थे। उस जमाने में जब बारात में लौंडा नाच होना ही बारात की शान समझी जाती थी उन्होंने स्पेशल ऑर्केस्ट्रा बुलवाया था ।
द्वारपूजा के बाद स्टेज पर वह सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ …….एक के बाद एक फ़रमाइशी गीतों पर लोग अपनी पसन्द की नर्तकी बुला पैसे निछावर कर ही रहे थे कि दो युवक मंच पर चढ़ नाचती हुई लड़की से उलझ पड़े…..सब के सब सन्न थे, लड़की अपनी बाँह छुड़ाने को प्रयत्नरत थी पर कौवे की चोंच में फँसी चुहिया छूटी है भला कभी ?
अभी यह चल ही रहा था की गज़ब हुआ..भीड़ को चुपचाप चीरते हुए आये आदित्य ने उसी मंच पर चढ़ दोनों युवकों की विधिवत पूजा की……कुछ देर पहले ढोल की थापों, बाँसुरी की तान, मजीरे की झनकार और हारमोनियम की सरगमों पर लयबद्ध नाचती नवयुवती के सुंदर पाँवो की थाप पर झूमता वह मंच अब आदित्य के मोटे बूटों की धमक और उन दोनों नवयुवकों की मर्मान्तक चीखों के बोझ तले दबा था ।
इनका सत्कार कर चुकने के बाद आदित्य ने मंच के कोने पर सहमी सी खड़ी उस नवयौवना का हाथ थामे खींचते हुये कमरे में ले जा बैठाया और पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए चिल्लाया आखिर क्यों नाचती हो इन भूखे लोगों के सामने ? और फिर अपने इस मूर्खतापूर्ण प्रश्न पर स्वयं ही झेंप गया ।
उसने दुबारा पूछा तुम्हारा नाम क्या है ? अबकी स्वर नर्म था ।
“खुशबू” एक पल को वह रुक कर फिर बोली ” उसे इतना नहीं मारना चाहिए था । अब तो यही नियति है मेरी ।”
आदित्य :- तुम्हारे लिए यह साधारण कैसे हो सकता है खुशबू ? आखिर तुम कोई वेश्या तो हो नहीं !
खुशबू :- लेकिन लोग तो समझते हैं न !
उसने ठंडी साँस ली और बोला
” खुशबू मुझे क्षमा करना लेकिन जब से तुम्हें देखा है एक हूक सी उठती है मन में , सहन नहीं होता की कोइबुस भाव से तुम्हें देखे । नृत्य कला की दृष्टि से पूज्य है किन्तु जो भाव लिए लोग तुम्हें देखते हैं वह ताज्य है ।
मेरे मन की अकुलाहट समझ सको तो ठीक अन्यथा क्षमा करना क्योंकि मुझे तुमसे प्रेम है । हाँ कुछ घण्टो पहले से ही ….जबसे तुम्हें देखा है; बोलो ब्याह करोगी मुझसे ? ”
खुशबू :- “यदि मैं अस्वीकार करूँ तो ?”
आदित्य :- वह तुम पर निर्भर है । मैं कोई दया या सहानुभूति नही दिखा रहा हूँ और न तो विवश करूँगा । तुम स्वतंत्र हो किन्तु एक निवेदन है , त्याग दो इस कार्य को , जीविकोपार्जन के हजार साधन हैं , मैं कुछ प्रबन्ध कर दूँगा । बस मेरा मान रख लो ।

खुशबू ने देखा ; उसकी आँखो में याचना थी, समर्पण था, अपनत्व का बोध था । उसने सोचा था कि यह आदित्य का क्षणिक आवेश है उसके अप्रतिम सौंदर्य के प्रति किन्तु यह तो सर्वथा उलट परिणाम निकला ।
उसे चुप देख आदित्य ने फिर बोला ” वचन देता हूँ कोई प्रपञ्च न रचूंगा किन्तु प्रतीक्षा भी करूँगा तुम्हारी क्योंकि मेरा प्रेम क्षणिक आवेग नहीं है भावनाओं का ! मैं पुरुष हूँ और अपने हिस्से का प्रेम निबाह जाऊँगा !”
इस वाक्य में जो पीड़ा और समर्पण था उसने खुशबू के हृदय में मुरझाई पड़ी प्रेम की बेल को नवजीवन दे हरा किया तो कुम्हलाया हुआ अँकुर फूट कर सुवासित पुष्प बन बैठा लेकिन क्षण भर की नमी के बाद पड़ने वाले सूर्यातप की परिकल्पना मात्र से वह काँपकर जाने को उद्यत हुए आदित्य को पकड़कर बोली “किन्तु हमारा आपका तो मिलन ही सम्भव नहीं है ! कहाँ आपके पिता की प्रतिष्ठा और उज्ज्वल कीर्ति और कहाँ मेरे कुल-गोत्र का ही कोई ठिकाना नहीं ! मेरे आगमन से क्या उनके सम्मान की उजली चादर मैली न हो जायेगी ?”

आदित्य कुछ क्षण अविचल बैठा रहा फिर बोला यदि तुम्हारी हाँ है तो बहुत सम्भव है पिता जी भी मान जाएँ । वह तो उठकर चला गया किन्तु वह चुपचाप उसी उदासीन भाव से बैठी रही । किंचित उसे ज्ञात था कि यह तथाकथित सभ्य समाज क्या धारणा रखता है उसके वर्ग के विषय में और बहुत सीमा तक वह सत्य भी है किन्तु सभी को एक सा समझना भी कौन सा न्याय है ?
आदित्य ने लक्ष्मी बाबू से सकुचाकर ही पूछा था कि पिता जी अगर मुझे किसी ऐसी कन्या से प्रेम हो जाये जिसके कुल-गोत्र का भी ठिकाना न हो तो क्या आप स्वीकृति देंगे ? लक्ष्मी बाबू को लगा शायद ठिठोली कर रहा है और थोड़ा मुँह बनाकर बोले फिर मैं तुम दोनों को गोली न मार दूँगा ! आदित्य ने सुनते ही हताश स्वर में कहा तो फिर मार दीजिये ।
लक्ष्मी सिंह चौंके, पूरी बात सुनी तो पुत्र की योग्यता को ध्यान में रख अपने हृदय में उठ आये जातिगत अहँकार को थोड़ा रोक कर बोले
यह निर्भर करता है कन्या के व्यवहार और प्रकृति पर ; फिर कुल-गोत्र नगण्य है मेरे लिए । भेंट करवाओ मुझसे उसकी । आदित्य उछल पड़ा था ….बोला चलिए और कमरे की ओर इशारा कर खुद वापस लौट आया ।
लक्ष्मी बाबू गए, सावधानी से कमरे में झाँका तो देखा खुशबू सिमटकर बैठी है, तनिक उदास थी पर दैवीय तेज मुखमण्डल पर फैला था , आँखे खुली ऊपर छत की ओर शून्य में कुछ ताकते हुए । गौरांग शरीर , बड़ी-बड़ी काली आँखे, लम्बी केशराशि और चेहरा ऐसा सौम्य की मन के सारे झंझावात शांत हो जाएँ ।

बाबू साहब की हिम्मत न हुई कि कमरे में प्रवेश कर सकें, दोनों हाथ उठकर कैसे जुड़ गए पता ही न चला । मन ही मन बोले माँ भवानी कृपा करना ! पलट कर आये तो जानकी को सीने से लगाकर बोलेइतना तेज है उसमें मानों माँ शारदा हों । ऐसी कन्या दिया लेकर खोजे न मिलेगी , सच कहता हूँ अगर वह आई तो तुम उसकी दासी बनती फिरोगी और वह तुम्हारी । जानकी ने उत्तर दिया जब बाप-बेटे की मर्जी है तो मेरी भी हाँ मानिये और फिर खुद को छुड़ाते हुए बोलीं ; और हाँ बुढ़ापे में ज्यादा प्रेम न छलकाए कीजिए ।

लक्ष्मी सिंह सब मङ्गल विचार सोने गए कि सबेरे खुद खुशबू से बात करेंगे लेकिन सुबह होते ही तूफ़ान आ गया ।
खुशबू गायब थी !
करीब दो घण्टो की भाग दौड़ के पश्चात एक लड़के ने आकर हाँफते हुए कहा चाचा ; नदी किनारे बँसखार में लाश पड़ी है…!
मानो बिजली गिर पड़ी हो….जो जैसे था था गिरते पड़ते पहुंचा, हाँ यह खुशबू का शव था ! दुष्कर्म के बाद गला रेतकर हत्या । नग्न शव पर पंडित मुरारी शुक्ला ने अपनी पगड़ी खोलकर डाल दी, लोग पूर्ववत जड़ खड़े थे! आदित्य भी चुप था ! वह न रोया, न चीखा – चिल्लाया ! शव के पास बैठे-बैठे उसने गालों पर हाथ फेरा ; खुशबू के चेहरे पर पीड़ा और अपमान की लकीरें मौत के बाद भी मौजूद थीं । उसने उसकी निष्प्राण कलाइयां अपने हाथ में लीं अपना डायन हाथ कुर्ते की जेब में डाला और एक झटके में रिवॉल्वर निकल कनपटी पर रख घोड़ा दबा दिया…….
यह दूसरा वज्रपात था …..पुलिस आ गयी थी अबतक..उसने अपना काम किया…कागजी कार्यवाही पूरी हुई । दोनो अपराधी पकड़े गए , सजा हुई पर उस दिन लक्ष्मी सिंह अपने बेटे और खुशबू का अंतिम संस्कार कर लौटे तो ऑर्केस्ट्रा से मुँह मोड़ लिया । कोई कितना ही लगा-सगा हो ; वह नहीं जाते ..! लोगों ने बेटे की मृत्यु का शोक मनाते उन्हें कभी नहीं देखा , अगर किसी ने संवेदना जताने की कोशिश की तो उसे झिड़क कर कहते नपुंसक था जो आत्महत्या की ! में होता तो खून पी जाता उन दोनों का ! लेकिन अंधियारी रातों में चादर से मुँह ढाँप-ढाँप कितना रोये हैं लक्ष्मी सिंह ये शायद कोई नहीं जानता ।

द्वारपूजा के बाद मंच पर एक से एक गाने बज रहे थे , बन्दूकों से हर्ष फायरिंग हो रही थी , लोग बाग-बाग अपनी पसन्द की डांसर को बुलवा रहे थे ।
अचानक वंशीधर बोले भगीरथ पाण्डे कहाँ हैं ?
लोगों ने इधर-उधर देखा और चौंके; अरे अभी यहीं तो थे! कहाँ गए ?
थोड़ी देर खोजने पर पाया की भगीरथ पांडे स्टेज से दूर पेंड़ के नीचे कुर्सी लगाये उधर पीठ कर शून्य में कुछ ताक रहे थे ।

(समाप्त)
– गौरव सिंह June 27, 2017 at 06:12PM

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s